शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026


लघु व्यंग्य -जब भक्ति भी बन गई बिजनेस डील!

“भक्त जी भगवान के दरबार में माथा टेकने नहीं, अपनी माँगों का टेंडर पास कराने आए थे!”

मंदिर में सुबह-सुबह भक्तों की लंबी कतार लगी थी। कोई सुख माँग रहा था, कोई शांति, कोई परिवार की खुशहाली की प्रार्थना कर रहा था। तभी एक भक्त जी हाथ में नारियल, फूलों की माला और जेब में इच्छाओं की लंबी लिस्ट लेकर पहुँचे।मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते ही बोले, “हे प्रभु! आज आपके सामने एक जरूरी प्रस्ताव लेकर आया हूँ। अगर मेरी माँगें पूरी हो गईं, तो आपकी भक्ति में कोई कमी नहीं छोड़ूँगा!”

भगवान की मूर्ति शांत थी, लेकिन भक्त जी का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर था।उन्होंने हाथ जोड़कर कहना शुरू किया, “प्रभु, सबसे पहले मेरी लॉटरी लगवा दीजिए। फिर एक बड़ा मकान, चमचमाती गाड़ी और बैंक खाते में इतने पैसे भर दीजिए कि नोट गिनने के लिए मुझे भी एक कर्मचारी रखना पड़े!”इतना कहकर वे रुके और बोले, “बदले में मैं हर मंगलवार को लड्डू चढ़ाऊँगा। बस एक छोटी-सी शर्त है—लड्डू का खर्च मेरी कमाई से नहीं, आपकी कृपा से निकलना चाहिए!”

पास खड़े एक बुजुर्ग ने पूछा, “बेटा, भगवान से प्रार्थना कर रहे हो या व्यापार का सौदा?”

भक्त जी तुरंत बोले, “बाबा, जमाना बदल गया है! आजकल बिना फायदे के कोई हाथ भी नहीं मिलाता। फिर भगवान से तो उम्मीद रखना बनता है!”बुजुर्ग मुस्कुराए, “लेकिन बेटा, भगवान से कुछ माँगने से पहले कभी यह भी पूछा कि तुम्हारे पास जो है, उसके लिए धन्यवाद देना चाहिए या नहीं?”

भक्त जी ने बात अनसुनी कर दी। अब उन्होंने अगला प्रस्ताव रखा, “प्रभु, इस बार मेरा प्रमोशन करवा दीजिए। पड़ोसी की नई गाड़ी से बड़ी गाड़ी दिलवा दीजिए। और हाँ, शर्मा जी का कारोबार थोड़ा धीमा करवा देना। आखिर प्रतियोगिता भी कोई चीज होती है!”

अब तो उनकी माँगों की सूची देखकर लगता था कि स्वर्ग में कोई सरकारी दफ्तर खुल गया हो और भक्त जी अपनी फाइल पर तत्काल मंजूरी चाहते हों।पूजा खत्म हुई तो भक्त जी ने जेब से दस रुपये निकाले, दानपात्र में डाले और बाहर निकलते हुए बोले, “प्रभु, एडवांस दे दिया है। बाकी काम होने पर चढ़ावा बढ़ा दूँगा!”

मंदिर के बाहर एक गरीब व्यक्ति बैठा था। उसने विनम्रता से पानी पिलाने की विनती की। भक्त जी के हाथ में पानी की बोतल थी, लेकिन उन्होंने मुँह फेर लिया।बुजुर्ग ने यह देखा तो कहा, “बेटा, भगवान को सोने का मुकुट चढ़ाने से पहले किसी जरूरतमंद की मदद कर देते, तो शायद तुम्हारी प्रार्थना का अर्थ कुछ और होता।”भक्त जी कुछ पल चुप रहे। पहली बार उन्हें लगा कि मंदिर में वे भगवान को अपनी इच्छाएँ गिना रहे थे। , लेकिन अपने व्यवहार का हिसाब देना भूल गए थे।

भक्ति कोई व्यापार नहीं, जिसमें चढ़ावे के बदले मनचाहा परिणाम माँगा जाए। भगवान के सामने बड़ी-बड़ी माँगें रखने से पहले इंसान को अपने भीतर झाँकना चाहिए।क्योंकि सच्ची भक्ति वह नहीं जो भगवान से कहे—“मुझे सब कुछ दे दो”, बल्कि वह है जो इंसान को सिखाए—“जो मिला है, उसके लिए आभारी रहो और जो कर सकते हो, दूसरों के लिए करो।”

वरना हाल यह हो जाएगा कि मंदिर में हम भगवान को प्रसाद चढ़ाएँगे और बाहर निकलते ही इंसानियत को भूखे पेट छोड़ देंगे!


रविवार, 27 सितंबर 2026

यूपीआई बनाम टेक्स

 लघु व्यंग्य -

UPI पर टैक्स

वो दिन दूर नहीं जब भारत में प्यार का इजहार करने से पहले इंसान शायद यह पूछने लगेगा—“सुनो, तुम पर कोई टैक्स तो नहीं लगा है न?”

भाई, जमाना बदल गया है।

एक समय था जब लोग जेबकतरे से डरते थे। अब आदमी जेबकतरे से कम और जेब में रखे मोबाइल के नोटिफिकेशन से ज्यादा डरता है। आखिर पता नहीं कब फोन बोले—“टिंग”

कल मैंने गोलगप्पे वाले को ₹10 का UPI किया। मन में सोचा, डिजिटल इंडिया जिंदाबाद

लेकिन कल्पना कीजिए, अगर उसी समय फोन से आवाज आए—

“टिंग आपके खाते से ₹10 कटे और सरकार के खाते में ₹2 का सद्भावना टैक्स जमा हुआ।”

अरे साहब! हम मिडिल क्लास वाले हैं। हमारी हालत पहले ही ऐसी है कि महीने की शुरुआत में खाते में पैसे देखकर लगता है कि जिंदगी सुधर गई, और महीने के अंत में बैंक बैलेंस देखकर लगता है कि शायद जिंदगी ने हमें ब्लॉक कर दिया है।

कैश तो वैसे भी जेब में नहीं रहता था। लेकिन डिजिटल इंडिया ने हमें एक अलग ही स्तर की फकीरी दे दी है।

पहले जब भिखारी पैसे मांगता था तो हम बड़ी शान से कहते थे—“भाई, छुट्टे नहीं हैं।”

अब जमाना बदल गया है।

भिखारी भी गले में QR कोड लटकाकर खड़ा हो सकता है और कह सकता है—“साहब, छुट्टे नहीं हैं तो कोई बात नहीं… स्कैन कर दीजिए!”

डिजिटल युग में गरीबी भी हाईटेक हो गई है।

अब डर इस बात का रहता है कि कहीं भविष्य में सरकार हर चीज पर कोई मजाकिया टैक्स न लगा दे।

मान लीजिए एक दिन फोन पर नोटिफिकेशन आए—

“आपने अपनी प्रेमिका को ‘आई लव यू’ का संदेश भेजा है। इस पर 18 प्रतिशत रोमांस टैक्स लागू होता है।”

आप बेचारे मोबाइल को देखकर सोचेंगे—“भाई, प्यार करना इतना महंगा कब से हो गया?”

और अगर आपने दोस्त को चाय के लिए ₹50 भेज दिए तो दूसरा नोटिफिकेशन आ सकता है

“आपने मित्र को चाय पिलाई है। कृपया 28 प्रतिशत यारी-दोस्ती शुल्क जमा करें।”

तब दोस्ती निभाने से पहले आदमी हिसाब लगाएगा कि चाय घर पर बनाना सस्ता है या दोस्ती खत्म करना। 

पहले बुजुर्ग कहा करते थे कि पैसा हाथ का मैल होता है।

सरकार ने शायद इस कहावत को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया होगा।

लोगों को डर लगने लगा है कि कहीं एक दिन हाथ धोने पर भी कोई डिजिटल रसीद न आ जाए—

“आपने अपने दोनों हाथ धोए हैं। कृपया स्वच्छता शुल्क जमा करें।”

मध्यवर्गीय आदमी वहीं बैठकर हाथ जोड़ देगा—“साहब, साबुन मैंने खुद खरीदा है, पानी का बिल भी मैं देता हूं… अब हाथ धोने का भी हिसाब मत मांगिए!”

सबसे मजेदार स्थिति तो तब होगी जब कोई बेटा अपनी मां को ₹100 UPI करे।

मां समझेंगी कि बेटा सब्जी के पैसे भेज रहा है।

लेकिन बेटा कल्पना करे कि कहीं मोबाइल पर कोई नोटिफिकेशन न आ जाए—

“आपने अपनी माता जी को ₹100 भेजे हैं। कृपया स्पष्ट करें कि यह घरेलू सहायता है या अघोषित आय?”

अरे भाई, वो धनिया मिर्ची लाने के पैसे हैं, स्विस बैंक का अकाउंट नहीं!

यही तो डिजिटल जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना है।

पहले पैसा देते समय आदमी सोचता था कि सामने वाला पैसा ले रहा है या नहीं।

अब पैसा भेजने के बाद आदमी मोबाइल देखकर सोचता है—“पेमेंट सफल हुआ या नहीं?”

फिर सामने वाले से पूछता है—“भाई, पैसा मिला?”

वह कहता है—“हाँ।”

फिर भी मन नहीं मानता।

“एक बार अपना फोन दिखाना”

भरोसा अब भावनाओं से नहीं, स्क्रीनशॉट से होता है।

और अगर कभी UPI से जुड़े किसी टैक्स या चार्ज की खबर सोशल मीडिया पर दिखाई दे जाए, तो लोग उसकी सच्चाई जांचने से पहले ही अपने खर्चों का हिसाब लगाने लगते हैं।

“अगर ₹100 भेजने पर ₹10 कटे तो?”

“अगर ₹500 भेजने पर ₹50 लगे तो?”

“अगर मां को पैसे भेजने पर भी शुल्क लगा तो?”

भाई, पहले खबर की सच्चाई तो देख लो!

क्योंकि आजकल पैसा भेजने की गति से भी ज्यादा तेज अफवाह फैलती है।

इसलिए अगली बार जब आप किसी को ₹5 का भी UPI करें, तो एक पल आसमान की तरफ देखकर मुस्कुराइए।

आप सिर्फ पैसे नहीं भेज रहे हैं…

आप डिजिटल जमाने की उस व्यवस्था का हिस्सा बन रहे हैं, जिसमें जेब खाली हो सकती है, लेकिन QR कोड देखकर खर्च करने की हिम्मत हमेशा बनी रहती है।

बस एक बात याद रखिए—

UPI से पैसा भेजना आसान है,
लेकिन अफवाहों पर विश्वास करके डरना उससे भी आसान है।

इसलिए स्कैन कीजिए, पे कीजिए और जानकारी की पुष्टि भी कीजिए।

क्योंकि डिजिटल इंडिया में सिर्फ पेमेंट तेज नहीं हुआ है…

अफवाहों की स्पीड भी 5G हो गई है!