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शनिवार, 6 मई 2017

बात की बात – गम

बात  की बात गम
‘’ साले इतनी छोटी उम्र में नशा करते तुझे शर्म नहीं आती |’’ थानेदार ने उसके गाल पर थप्पड़ जमाते हुए पूछा |
‘’का करें साब मजबूरी है |उसने मिमियाती आवाज में कहा |
‘’काहे की मजबूरी बे ?’’
‘’ गम भुलाने की |’’
‘’किस बात का गम बे किसी छोरी का |’’
‘’जी नहीं साब | मां-बाप का |’’
‘’ का वे मर गए हैं....|’’
जी नहीं |’’
‘’तो काहे का गम बे |’’
‘’ साब वे खुद अपना गम भुलाने के लिए नशे में डूबे रहते हैं | मेरा ख्याल तक नहीं रखते |इसलिए मैं भी उनका गम भुलाने के लिए....|’’
‘’
               सुनील कुमार ‘’सजल’’


गुरुवार, 17 सितंबर 2015

लघुव्यंग्य- गम

लघुव्यंग्य- गम

‘’ इतनी छोटी उम्र में नशा करते हुए तुझे शर्म नहीं आती |’’ थानेदार  ने उसके गाल पर थप्पड़ जमाते हुए पूछा |
‘’ का करूँ साब मजबूरी है |’’ उसने मिमियाती आवाज में कहा |’
‘’ काहे की मजबूरी बे |’’
‘’ गम भुलाने की |’’
‘’ किस बात  का गम बे | किसी छोरी का |’’
‘’ जी नहीं साब ! मां बाप का |’’
‘’ का वे मर गए .....|’
जी नहीं.....|’
‘’ तो काहे का गम बे ....|’
‘’ साब वे खुदअपना गम भुलाने के  लिए नशे में डूबे रहते हैं | मेरा ख्याल नहीं रखते | इसलिए मैं भी उनका गम भुलाने के लिए...|’
 थानेदार  के उसके शरीर पर चलते हाथ वहीँ ठहर गए |

      सुनील कुमार ‘’सजल’